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प्रार्थना

by Madhuri Dubey
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प्रार्थना

अभी कुछ दिन पुरानी बात है किसी ने मुझे एक मंदिर का पता बताया, 

 वहां जाने से पूरी होती हर मुराद,  ऐसा विश्वास दिलाया। 

 मैंने अपनी और अपनों की मुरादों की लंबी लिस्ट बना ली और चल पड़ी मांगने, 

 सब कुछ संभव असंभव, 

मंदिर के द्वार पर भक्तों की लंबी कतारें देखी, 

 अंधा आंखें,  लंगड़ा टांगे,  निर्धन धन,  नि:संतान संतान मांग रहा था, 

 दुखियों की पीड़ा देख मेरा हृदय भी पीड़ा से भर गया, 

 मेरे मन में विचार आया, 

 क्यों यह मैं नाशवान  वस्तुओं से मोह रख रही हूं, 

 जो कल किसी की थी और कल किसी और की होगी, 

 मैं मंदिर स्वयं चल कर आई हूं, 

 मैं कर सकती हूं मूर्ति के भव्य रूप के दर्शन, 

 मेरे पास पुत्र है,  पुत्री है,  बड़ों का आशीर्वाद,  छोटो का ढेर सारा स्नेह है। 

 इन सभी विचारों के आते ही, 

 मैंने कुछ मांगने का विचार त्याग दिया

 मां की मूर्ति को सर झुका कर प्रणाम किया और दिया धन्यवाद

 उसके लिए जो दिया है उन्होंने मुझे

 इतना करते ही मेरी झोली प्रसन्नता से भर गई, 

 तभी से मुझे जो मिला है उसे बांट रही हूं और मेरी झोली भरी है खुशियों से लबालब। 

 

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