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जीवनसाथी

by Sanjay Shastri
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चंद्र प्रकाश गुप्ता शहर का एक करोड़पति व्यक्ति है लंबा चौड़ा शरीर चेहरे पर घनी मूछें भूरी आंखें और उन पर सुनहरी फ्रेम का चश्मा उनके व्यक्तित्व में और निखार लाता है। स्वभाव से बहुत शांत और कोमल दिल के व्यक्ति जब से उनकी धर्मपत्नी का स्वर्गवास हुआ तब से और भी ज्यादा शांत रहने लगे है।  उनका एक ही लड़का है रवि वह भी अपने पिता के स्वभाव का सीधासाधा 24 25 वर्ष का लड़का था, संगीत में विशेष रुचि रखता था,  पढ़ाई खत्म करके वह भी पिता के साथ बिजनेस में हाथ बताने लगा।

रवि की मां बचपन में ही गुजर गई थी,  उसका पालनपोषण हवेली के सबसे पुराने और विश्वसनीय नौकर गोविंद काका ने ही किया था।  बड़ा विचित्र संयोग था कि काका की पत्नी अपने पीछे एक छोटी सी लड़की कल्ली को छोड़ गई थी।  काका ने ही दोनों बच्चों को पाला था

हवेली में सब रवि कोछोटे मालिककहां करते थे और चंद्र प्रकाश गुप्ता कोबड़े मालिक  गुप्ता जी को जब पहली बार दिल का दौरा पढ़ा था तो पूरी बरेली में भगदड़ मच गई थी,  क्योंकि कम से कम हवेली का तो हर व्यक्ति गुप्ता जी को देवता से कम नहीं मानता था।  रवि की तो हालत ही खराब थी। जब तक गुप्ता जी ठीक ना हो गए उसकी रातों की नींद उड़ गई थी वह हमेशा गुप्ता जी के पास ही बैठा रहता था।

एक दिन गुप्ता जी को रवि अखबार पढ़कर सुना रहा था कि गुप्ता जी बीच में ही बोले

रवि

जी पापा

बेटा मैं कई दिनों से सोच रहा हूं कि बेटा अब मेरा कोई भरोसा नहीं है।

पापा आप कैसी बात कर रहे हो,  आप यह उल्टी सीधी बातें मत सोचा करो।

नहीं बेटा यह सच है मैं अपने सामने इस हवेली को इसकी मालकिन देना चाहता हूं।

वाह मालिक का बात कही है हम भी यही कहना चाहते हैं कि अब छोटे मालिक की शादी कर दो,  कैसे कि आप दोनों तो सरकार फैक्टरी चले जाते हो मगर हमें सरकार हवेली बहुत सूनी सूनी लगती है बहु रानी ले आओ तो हवेली में रौनक जाएगी।

काका फिर एक व्यक्ति का काम तुम्हारे ऊपर और बढ़ जाएगा

बिल्कुल नहीं छोटे मालिक

बीच में जाने कहां से कल्ली   टपकी

छोटी मालकिन की सेवा के लिए हम जो हैं

रहने दे अपनी नाक तो खुद साफ कर नहीं पाती यह करेगी छोटी मालकिन की सेवारवि बोला

सब हंसने लगे कल्ली  चुपचाप सर झुकाए खड़ी रही।

रफीक चाचा भी वहीं खड़े थे,  रफीक चाचा दरअसल गुप्ता जी के बहुत पुराने ड्राइवर थे।  उम्र ज्यादा होने के कारण उन्हें सब इज्जत से चाचा कहते थे। बोले  हां मालिक, जब तक घर में औरत ना हो तो घर अधूरा रहता है। जब से मालकिन गुजरी है हवेली की रौनक ही चली गई है।

देखो भाई सब की यही राय हैगुप्ता जी बोले

लेकिन पापा मैं अभी शादी नहीं करना चाहता।

अच्छा बेटा तो शायद मेरी आखिरी इच्छा पूरी ना हो पाएगी

पापा आप…………. अच्छा जो आप ठीक समझेकहकर रवि वहां से उठकर चला गया,  सभी के चेहरे खुशी से चमक उठे।

सुबह रवि कि जब नींद खुली तो सुबह का 8:00 बजा था वह उस समय और ज्यादा आश्चर्यचकित रह गया जब उसने,  पास में कल्ली को चाय की ट्रे लिए खड़ा पाया।

कल्ली सबकी मुंह लगी थी किसी से भी कुछ भी बोल देना उसकी  आदत थी,  और कोई उसका बुरा भी नहीं मानता था बल्कि उसे छेड़ने में सबको मजा आता था। रवि और उसकी उम्र में थोड़ा ही फर्क था वह तीनचार साल छोटी होगी।

इस समय भी वह कह रही थी

क्यों छोटे मालिक लगता है रात भर मालकिन के ख्याल में सोए नहीं, वरना इस समय तो आप सुबह का कोई राग छेड़ रहे होते हैं

ज्यादा बकबक मत किया कर चाय रख और जा यहां सेरवि खींजकर बोला।

रवि सोच में पड़ गया सच तो यही था कि रात को उसे नींद नहीं आई थी।

कल वाली बात ने उसे काफी परेशानी में डाल दिया था। वह अभी वास्तव में शादी के लिए मानसिक रूप से अपने आप को तैयार नहीं कर पा रहा था। उसको तो शादी का कभी ख्याल भी नहीं आया था।  साथ ही वह ऐसी लड़की से शादी करना चाहता था जो उसके पिता को उतना ही सम्मान दे और सेवा करें जितनी वह करता है। वह इस बात से भी भयभीत था कि कहीं पिताजी के सारे सपने जो उसकी शादी के लिए वह देख रहे हैं चूरचूर ना हो जांए।  जिन की खुशी के लिए वह शादी के लिए हां कर रहा है कहीं शादी के बाद उनकी आशाओं पर पानी फैल जाए।  उसने निर्णय लिया कि वह बहुत सोच समझकर ही शादी करेगा।

वह सोचने लगा कि वह कैसी होना चाहिए जो पापा के सपनों को पूरा कर सके।

अरे छोटे मालिक आपकी चाय तो ठंडी हो गई होगी इस कमबख्त को कहा था कि यह तेरे बस का काम नहीं है,  मगर उसको तो कल वाली बात लग गई है कि वह अपनी मालकिन की सेवा नहीं कर सकती,  तो आज सुबह जल्दी उठकर वही सारे काम करने में जुटी है।  मैं अभी गर्म चाय लेकर आता हूं।

नहीं काका उसकी गलती नहीं है मैंने ही उसे भगा दिया था

गुप्ता जी के यहां यह नियम था कि सब सुबह जल्दी नहा लिया करते थे।  गुप्ता जी तो सुबह 5:00 बजे नहा धोकर पूजा करते थे और 7:00 बजे रवि के साथ चाय लेते और अखबार पढ़ते थे और 9:00 बजे हल्का नाश्ता करके फैक्ट्री चले जाते थे। रवि भी सुबह जल्दी नहा कर अपने कमरे में तानपुरा लेकर बैठ जाता था और शास्त्रीय गायन का रियाज करता था।  उसका सिर्फ एक ही शौक था संगीत।  संगीत उसकी रंग रंग में समाया था मगर उसके एक शौक का ना तो जब पढ़ता था तब पढ़ाई पर ही कोई बुरा असर पड़ा और ना ही अब अपने काम पर।  गुप्ता जी को भी उसके इस शौक से कोई तकलीफ नहीं थी बल्कि वे उसे और बढ़ावा देते थे।

जब से पढ़ाई खत्म हुई है रवि भी  9:00 बजे गुप्ता जी के साथ फैक्ट्री जाने लगा और उनके काम में हाथ बटाने लगा था।

गुप्ता जी ने अपनी मेहनत और ईमानदारी से इतना सारा पैसा कमाया था  इसलिए शहर में आज उनकी इतनी इज्जत थी।  रवि की शादी की बात लोगों में फैलते देर नहीं लगी बल्कि यह कहा जाए कि रवि पर कई रईसों की नजर थी जो अपनी लड़की की शादी उससे कराना चाहते थे। भला कौन अपनी लड़की को एक करोड़ पति बाप की इकलौती संतान से नहीं ब्याहना  चाहेगा।

कई रिश्ते आना शुरू हुए,  कई आए, जिनमें अधिकांश को तो गुप्ता जी ने ही नापसंद कर दिया जो बचे उनको रवि की पसंद के लिए छोड़ दिया।

रात को खाने के बाद रवि अपने बेडरूम में लेटा कोई काम कर रहा था कि कल्ली टपक पड़ी बोलीछोटे मालिक बड़े मालिक ने यह कुछ फोटो भेजे हैं यदि आपको इनमे से कोई पसंद हो तो मैं उनको बता दूंगीरवि  सिर्फ मुस्कुरा दिया। कल्ली ने उसके  हाथ में पैकेट दिया तो बोलातू खुद पसंद कर ले कि तेरी मालकिन कैसी हो जो पसंद जाए तो जाकर बता देना

हां यह हुई ना कोई बात

कल्ली  ने खुश होकर पैकेट में से फोटो निकालें और एक एक देखने लगी।

एक फोटो देखी

वाह क्या सूरत है भूतनी जैसीरवि जोर से हंस दिया

मालिक यह मुंह पर क्याक्या लाल पीला नीला पोते रहती है? “

क्यों तेरी इच्छा नहीं पोतने की? “

बिल्कुल नहीं अच्छी सूरत तो बिना लीपे पोते  ही अच्छी लगती है

अरे वाह तू तो बहुत समझदारी की बात करने लगी है रे

मालिक हमें तो इन फोटो में से एक भी अच्छी नहीं लगी अब तुम जानो यदि तुम्हें कोई पसंद हो तो

जब तुझे पसंद नहीं तो फिर मैं क्या कर सकता हूं मालकिन तो तुझे लाना है जा पापा को बता दे कि इनमे से कोई पसंद नहीं

मगर आप भी तो देख लो

मुझे नहीं देखना अच्छा तू यह बता कि तेरी मालकिन कैसी होना चाहिए? “

मेरी मालकिन की आपकी घरवाली? “

अच्छा बाबा मेरी घरवाली

खुली सोच में पड़ गई बड़ी गंभीरता से बोली

मालिक आपके जैसी सीधीसादी और बहुत खूबसूरत ना भी हो मगर मन की सुंदर हो, सुख दुख में आपका साथ दे, आपको अपने हाथ का बना स्वादिष्ट खाना खिलाएं और सबसे बड़ी बात कि बड़े मालिक की भी खूब सेवा करें और मालिक खूब समझदार हो और हमें भी ज्यादा ना डाँटे।

रवि जोर से हंस दिया वह कल्ली को जितनी गवार और बेवकूफ समझता था,  आज उसके विचार सुनकर तो वह आश्चर्यचकित रह गया।  ठीक यही तो तस्वीर उसके दिमाग में थी जो अभी कल्ली ने बताई इसका मतलब यह हुआ कि यह जितना भी बेवकूफ दिखती है उतनी है नहीं,  वह सोचने लगा।

आजकल गुप्ता जी घर में ही रहते थे।  रवि ही फैक्ट्री का सारा काम देखता था 1:00 बजने वाले थे।  रवि फैक्ट्री के ऑफिस की फाइलों मैं उलझा था कि फोन की घंटी बजी।  उस तरफ कल्ली थी,  बहुत घबराए हुए स्वर में बोलीछोटे मालिक जल्दी आइए बड़े मालिक की तबीयत बहुत खराब हो गई है।

रवि कुछ बोला भी नहीं और भागा, ऑफिस में सब चौंक गए जिस तरह से वह भागा था,  जरूर कुछ बुरी खबर है,  सब कुछ शंका हुई

पता नहीं 20 किलोमीटर का सफर रवि ने कैसे पूरा किया। उसका दिमाग काम ही नहीं कर रहा था। हवेली का गेट दरबान ने पहले ही खोल रखा था शायद डॉक्टर भी पहुंच गया था। पोर्च में कार के टायर बुरी तरह से घिसटा गए। एक सांस में वह हवेली में घुसा और भागता हुआ गुप्ता जी के कमरे में पहुंचा। डॉक्टर जैन अपने असिस्टेंट के साथ वहां थे और उन्हें इंजेक्शन लगा रहे थे।  गुप्ता जी बेहोश पड़े थे और बेहोशी  में बड़बड़ा रहे थेबेटा” “ बेटा

पापा में गया हूं आप फिकर मत कीजिए

अंकलरवि ने डॉक्टर जैन की तरफ देखा

इनको जल्दी से हॉस्पिटल ले चलना है।

पापा पापा आंखें खोलिएरवि बोला उसका गला भर्रा रहा था।

और सच में गुप्ता जी ने आंखें खोल दी एक नजर उन्होंने सब पर डाली और रवि की तरफ देखने लगे।

पापा पापा

तभी डॉक्टर जैन ने रवि के कंधे पर हाथ रखा और गुप्ता जी की आंखें बंद कर दी। आखिरी समय उन्होंने अपने बेटे को देखते हुए काटा था।

रवि दहाड़ मार कर रोने लगा सब रो रहे थे डॉ जैन की आंखों में भी आंसू थे।

रवि चिल्ला रहा थापापा मुझे आपने इतना कम समय दिया कि मैं आप की आखिरी इच्छा भी पूरी ना कर सका,  पापा आप मुझे क्यों छोड़ गए मैं कितना अभागा हूं,  मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है।रवि उनकी छाती से चिपक कर रो रहा था कल्ली का तो बुरा हाल था,  वह तो बस गुप्ता जी के पलंग का पाया पकड़ कर रो रही थी।  गोविंद काका तो गुप्ता जी के पैरों में पड़ा फूटफूट कर रो रहा था।  हवेली का हर आदमी रो रहा था कोई किसी को ढांढस नहीं दे रहा था,  सब फूटफूटकर रो रहे थे।

रवि तो अब अनाथ ही हो गया था क्योंकि बिन मां का तो पहले से ही था और अब तो पिता भी नहीं रहे।  कोई सगा रिश्तेदार भी था डॉक्टर जैन रवि को धीरज बांधने के लिए कह रहे थे मगर उस पर तो पहाड़ टूट पड़ा था।

समय हर गांव का मलहम है गुप्ता जी की मौत के बाद रवि का दिल टूट गया वह अब अपने कमरे में ही बैठा रहता। अब उसका सारा खाली समय संगीत साधना में ही कटने लगा।

सब कुछ वही था मगर अब हवेली पर घने गम के बादल छाए रहते थे। एक बरस बीत गया। अब लोग फिर से रवि के रिश्ते के लिए आने लगे मगर अब तो रवि का मन ही उचट गया था। वह सब कुछ साफ मना कर देता कुछ तो बुरा मान कर चले गए कुछ जो ज्यादा बेशर्म थे वह अभी भी आस लगाए थे।

एक दिन कोविंद काका ने ही खाना परसते  समय बात छेड़ी।

मालिक एक बात कहूं

बोलो काका इसमें पूछने की क्या बात है.”

एक बड़े मालिक की इच्छा उनके मरने के बाद भी पूरी नहीं करोगे क्या? “

काकारवि चीख पड़ा।

मालिक हम छोटे मुंह बड़ी बात इसलिए नहीं कहना चाहते थे।

नहीं काका यह बात नहीं है पापा का सपना तो मैं भी पूरा करना चाहता हूं मगर जैसी बहू की उनकी इच्छा थी वैसी मिलेगी कहां?”

मालिक ढूंढने से तो भगवान भी मिल जाते हैं।

अच्छा अब तुम कल्ली की भी शादी कर दो

मालिक यही चिंता तो मुझे खाए जा रही है एक जगह बात चली थी मगर

मगर क्या खर्चे की फिकर मत करना

मालिक हम अपनी तनख्वाह से कर्जा चुका देंगे

कैसा कर्जा हमसे कर्जा लोगे?”

दोबारा यह बात मत कहना, हमारा भी तो कोई हक है कि नहीं, पापा ने कभी भी कल्ली को घर का सदस्य से कम समझा है

धन्य हो सरकार आपको हमारी उमर लग जाएबूढ़े की आंखों में आंसू थे।

सुबहसुबह रवि की नींद किसी के रोने की आवाज सुनकर खुली देखा तो कल्ली जमीन पर बैठी पलंग पर उसके पैरों पर सिर रख रो रही है।

अरे क्या हुआ क्यों रो रही है?”

एकदम बिफर पड़ी एक साथ में बोलीबापू हमारी शादी कर रहे हैं, हमें उन्होंने बताया कि आप ने सारा खर्च उठाने का कहा है।

हमें नहीं करनी शादी वादी हम तो यही हवेली में आप और मालकिन की सेवा में अब जिंदगी गुजार देंगेवह सिसकियां ले रही थी

रवि हंस पड़ाअरे भाई हर लड़की को एक दिन तो पराए घर जाना ही पड़ता है

हमें नहीं जाना बसऔर वह दौड़ती हुई चली गई

और वह दिन भी आया जब की कली की बारात आनी थी। वह आखरी तक मना करती रही मगर गोविंद काका की फटकार ने उसे चुप करा दिया।

रवि ने पूरी हवेली दुल्हन की तरह सजवा दी थी। गोविंद काका तो खुशी से फूला नहीं समा रहा था हर मिनट पर वह रवि को दुआएं देता जा रहा था।

बारात आई रवि ने बारात का दरवाजे पर स्वागत किया। दूल्हा देखने में भी ठीक था और सरकारी दफ्तर में बाबू था। बारातियों की तो आंखें फटी की फटी रह गई उन्होंने इतने शानदार स्वागत की कल्पना ही नहीं की थी।

कल्ली को दुल्हन बनाया गया सुहाग का जोड़ा उस पर खूब जच रहा था। उसने क्या किसी ने भी ना सोचा था कि उसकी इतनी शानदार शादी होगी। उसकी सहेलियां उससे मजाक कर रही थी मगर वह चुपचाप आंखों में गहरी खामोशी लिए बैठी थी।

फेरों का समय आया अग्नि के चारों ओर फेरे लिए जाने लगे पंडित जी जोर जोर से मंगल श्लोक बोल रहे थे।  रवि भी बैठा बड़े ध्यान से कल्ली को देख रहा था। आज उसे लगा कि समय कितनी जल्दी कट गया कल तक जो लड़की इस हवेली में यहां वहां उछलती फिरती थी आज वह ब्याह कर हवेली छोड़ देगी। भले ही वह एक नौकर की बेटी थी मगर वह भी हवेली की एक सदस्य थी, उसकी कमी सबको अखरेगी।

अभी 4 फेरे ही हुए थे कि अचानक दूल्हा सीना पकड़ कर गिर पड़ा, सब दौड़े एकदम भगदड़ मच गई। उसके मुंह से झाग निकल रहा था।

रवि ने तुरंत डॉक्टर को फोन कर दिया था। महिलाओं में रोना मच गया किसी की समझ में नहीं आया कि यह अचानक क्या हो गया, तभी डॉक्टर भी गया नवज देखी तो…….

एक बार फिर हवेली में रोना पीटना मच गया गोविंद काका तो कुछ समय तक सकते में खड़ा रहा फिर बेहोश होकर गिर गया।

बहुत गहरा धक्का लगा था काका को,  हवेली फिर से मनहूसियत में डूब गई काका ने तो उस दिन से जो खाट  पकड़ी तो फिर उठ ना सका।

खाट पर पड़ा पड़ा रोता रहता और कली की किस्मत को कोसता रहता। रवि ने उसके इलाज में कोई कसर रखी थी मगर कोई फायदा ना था।

उस दिन रवि काका को देखने अस्पताल गया तो काका फूटफूट कर रोने लगा बोला

मालिक आप मेरा तो आखिरी समय है, इस अभागन का जाने क्या होगा। पैदा होते ही मां मर गई अब सुहागन होते ही विधवा हो गई, मालिक एक दया करना मेरे मरने के बाद इसे अपने पैरों में ही पड़ी रहने देना दुनिया बहुत बुरी है और इसका कोई नहीं है। मालिक मैंने सारी जिंदगी आपकी सेवा में गुजारी है इसे भी इसी तरह काटना होगा।

रवि काका तुम ठीक हो जाओगे फिर भी इसकी तुम फिकर मत करो मैं वचन देता हूं

काका के चेहरे पर बड़ा आदमी संतोष था।

और एक दिन गोविंद काका भी चल बसा।

उस दिन रवि भी खूब रोया था गोविंद काका ने ही तो उसकी मां का फर्ज अदा किया था। पिता के बाद गोविंद काका की ही वह सबसे ज्यादा इज्जत करता था।

कल्ली अब सारा दिन हवेली में काम करती रहती। रवि की हर बात का वह ध्यान रखती। पर अब पहले वाली कल्ली में और आज की कल्ली  में बहुत फर्क था। जो एक पल भी चुप ना रहती थी वह अब दिन में कुछ ही शब्द बोलती थी।

रवि की जिंदगी में अचानक कितने दुख गए थे। जिसने जिंदगी में आज तक एक जरा सी भी परेशानी ना उठाई हो उसके ऊपर इतने सारे दुख आने पर वह बर्दाश्त कर सका। उसके मित्र उसे घेरे रहते और वह जो पहले अकेले रहना पसंद करता था, आजकल अकेलेपन से दूर रहता,  दोस्तों के साथ आवारागर्दी करता रहता और वे उसका मनोरंजन करने में और जेब साफ करने में लगे रहते।

रवि शाम को ऑफिस से आया ही था कि कल्ली ने बताया कि सोहनलाल सराफ आए हैं।

सोहनलाल सराफ गुप्ता जी के अच्छे मित्रों में से थे और रवि को मालूम था कि वह अपनी लड़की रश्मि की शादी उसके साथ करना चाहते थे।

रवि जब ड्राइंग हॉल में पहुंचा तो उसने देखा कि सोहनलाल जी अकेले नहीं साथ में उनकी पत्नी और रश्मि भी थीं।

नमस्ते अंकल” “नमस्ते आंटी

सदा खुश रहो बेटेसोहनलाल जी बोले,

हेलो रविरश्मि ने मुस्कुराते हुए कहा,

हेलोरवि ने भी चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट लाते हुए कहा।

काफी दिनों से तुम्हारा हमारी तरफ आना नहीं हुआ बेटाश्रीमती लाल बोली

हां आंटी वह क्या है कि आजकल काम में कुछ ज्यादा व्यस्त रहता हूं

काम में की तानपुरे में?” रश्मि ने व्यंग से हंसते हुए कहा,

रवि को उसका यह मजाक अच्छा ना लगा।

बेटा दरअसल मैं तुमसे साफसाफ बात करने आया हूं। स्वर्गीय गुप्ता जी मेरे कितने अच्छे दोस्त थे यह तो तुम जानते ही हो, गुप्ता जी ने तुम्हारे लिए रश्मि को पसंद किया था और उनकी यही अंतिम इच्छा थी की रश्मि इस घर की बहू बने तो बेटा मैं तुम्हारी राय जानना चाहता हूं।

अंकल अब मैं क्या कहूंरवि कुछ अटक रहा था,

जो पापा ने सोचा था उसके खिलाफ तो मैं जा नहीं सकता

यही तो यानी कि तुम्हारी हांरश्मि बहुत उत्साह से बोली

श्रीमती लाल ने रश्मि को इशारा किया कि चुप रहो,

तो बेटा हम यह शुभ कार्य जल्दी ही करना चाहते हैं,

तो सगाई कब रखेंवह बोले

देखिए अंकल अभी कुछ दिन और रुकिएरवि बोला

कब तक

मैं आपको खुद बता दूंगा

कल्ली कॉफी ले आई थी,  उसने उन लोगों की सब बात सुन ली थी। कॉफी पीकर लाल परिवार चला गया। उनके जाते ही कल्ली बोलीमालिक क्या आपने सच में रश्मि मैम साहब के साथ शादी का फैसला कर लिया है?”

अरे नहीं उससे शादी करने से अच्छा तो उम्र भर कुंवारा रहना हैरवि बोला।

कल्ली ने चैन की सांस ली क्योंकि उसे रश्मि बिल्कुल पसंद नहीं थी। सूरत देखने में जरूर अच्छी थी मगर हावभाव बोलचाल का तरीका ज्यादा मॉडर्न बनने के कारण बेहूदा था। लाज, शर्म,  बेशर्मों जैसे कपड़े पहने घूमती रहती थी।

दो दिन बाद ही डॉक्टर जैन सपरिवार टपके उनकी लड़की भी शादी के लायक थी और वह भी गुप्ता जी के घनिष्ठ मित्रों में से थे। वे भी यही कह रहे थे कि गुप्ता जी ने उनकी लता से उसकी शादी करने का वचन दिया था।  रवि क्या कहता उसने उनको भी किसी तरह टरकाया।

रवि परेशान हो गया जो भी आता वह यही कहता है कि गुप्ता जी ने उसकी बहन या बेटी से उसकी शादी तय कर दी थी। वह सोच रहा था कि यह तो संभव ही नहीं है क्योंकि उनमें से कोई भी उसे पसंद नहीं थी।

शायद रवि के बुरे दिन अभी गए नहीं थे तभी तो उसकी कंपनी को कई करोड़ का घाटा हो गया और कंपनी दिवालिया घोषित हो गई।

यही बहुत बड़ा धक्का था और कमी थी तो हवेली की कुर्की का नोटिस भी गया। रवि के बस का कुछ ना था फिर भी उसने कईयों के आगे हाथ फैलाए मगर किसी ने कोई सहायता की। कल तक जो अपनी लड़कियों के रिश्ते लेकर आते थे, आज उनके पास मिलने का समय नहीं था।

और एक दिन स्वर्गीय चंद्र प्रकाश गुप्ता की पुश्तैनी हवेली नीलाम हो गई।  रवि जो कल तक करोड़पति था आज सड़क पर गया उसके दोस्त यार और गुप्ता जी के घनिष्ठ मित्रों ने तक हाथ झटक दिए।

केवल एक ही व्यक्ति था जो उसके साथ था वह थी कल्ली।

हवेली नीलाम हो गई,  रवि खून के आंसू रोया उसके पास शहर छोड़ने के अलावा कोई रास्ता था। रवि और कल्ली दोनों ने शहर छोड़ दिया और मुंबई गए। बहुत नौकरी ढूंढी मगर कुछ हाथ ना लगा। पैसे सारे खत्म हो चुके थे। उन्होंने एक छोटा सा मकान किराए पर ले रखा था। रवि दरदर की ठोकरें खा रहा था। कल और आज में कितना फर्क गया था। कल्ली ने बर्तन मांजने का काम शुरू कर दिया। रवि को यह बात बहुत अखरी मगर क्या करता यदि ना करती तो खाते क्या?

एक दिन शाम को रवि घर में घुसा तो बहुत खुश था

कल्ली कल्ली आज मालूम मैं बहुत खुश हूं,  मुझे नौकरी मिल गई है

कल्ली ने देखा रवि के चेहरे से ऐसा लग रहा था कि शायद कोई बहुत बड़ा खजाना मिल गया है कल्ली भी बहुत खुश हुई मगर अंदर ही अंदर कहीं कुछ दर्द था। समय समय की बात है कल तक उसके मालिक लोगों को नौकरी देते थे, आज खुद एक छोटी सी संगीत के मास्टर की नौकरी पर ही इतने खुश हो रहे हैं।

लेकिन उसने एक अरसे के बाद रवि के चेहरे पर खुशी देखी थी।  भगवान ने शायद उनकी सुन ली थी कम से कम दाल रोटी की तो व्यवस्था हो गई।

समय ने फिर करवट बदली और रवि संगीत की शिक्षा देते देते गायक और संगीतकार हो गया। उसकी संगीत साधना उसके काम आई गायन का शौक शायद इसी दिन के लिए ही था। उसकी आवाज का जादू ऐसा छाया कि कुछ ही महीनों में उसका नाम हर संगीत प्रेमी के जुबान पर था।

रवि ने भी फिर मुड़कर पीछे नहीं देखा दौलत शोहरत दोनों उसके कदम चूमने लगी। मगर अपने बुरे समय को ना भूल सका। अपनी खोई हुई पिता की संपत्ति पुनः खरीद ली,  दोनों फैक्ट्री भी खरीद कर पुनः नए सिरे से व्यापार शुरु किया। व्यापार तो उसके खून में था सो जल्दी सब ठीकठाक जम गया।

समय बदला तो लोग बदले समाज में पुनः प्रतिष्ठा मिल गई।

लोगों ने फिर रंग बदला, कल जो लोग रवि का साथ छोड़ कर चले गए थे, आज फिर आने लगे बल्कि पहले से ज्यादा लड़कियां उससे शादी करना चाहती थी।

उस दिन कल्ली ने ही कहा

मालिक अब ईश्वर की कृपा से अपने दिन फिर ठीक हो गए हैं, अब आप मालकिन ले आओ और बड़े मालिक की आखिरी इच्छा पूरी करो।

रवि बोलाअच्छा ठीक है

अगले सप्ताह आपका जन्मदिन है उस दिन ही आप मालकिन का चुनाव कर लो

मालकिन ना हो गई कोई एमएलए हो गई,  अच्छा ठीक है उस दिन मैं तेरी मालकिन चुन लूंगा।

यह बात हवेली के हर व्यक्ति के कान में पहुंची और जंगल में आग की तरह शहर में फैल गई हर व्यक्ति यह सोच रहा था कि कौन है वह भाग्यशाली?

आज रवि का जन्मदिन था शहर के ही नहीं देश के बड़ेबड़े लोग थे, हवेली दुल्हन की तरह सजी थी।

रश्मि, लता, हेमा, प्रिया, सुनीता, श्रद्धा, लीना, टीना और भी जाने कितनी लड़कियां अपनी किस्मत का फैसला सुनने आई थी।

रवि ने बर्थडे केक काटा तालियों से हवेली गूंज उठी। सबको जिस बात का इंतजार था वह अभी बाकी थी ऐसा राज जो सिर्फ वही जानता था। डिनर भी हो गया मगर रवि ने कोई घोषणा नहीं की,  अब तो लोगों का सब्र का बांध टूट गया,  जैन साहब ने तो बोल ही दियारवि तुम्हारी लाइफ पार्टनर का क्या हुआ भाई हम सबको इंतजार है।

कल्ली उस समय सफेद साड़ी पहने लोगों को काफी सर्व कर रही थी,  कि रवि की आवाज सुनकर वह बड़ी उत्सुकता से उधर ही देखने लगी।

रवि की आवाज गूंजी,  सब एकदम शांत सुंदरियों की तो सांस ही रुक गई थी।

आप सब कुछ जिसका इंतजार है अब मैं आपको उस से मिलवाने जा रहा हूं।

रवि की नजरें एक एक लड़की पर से हटती हुई आगे बढ़ने लगी,  बड़े उत्तेजना के क्षण थे और आखिर में रवि की आंख एक चेहरे पर जाकर ठहर गई।

मेरा जीवन साथी वह हैरवि ने इशारा किया,

सब उस तरफ ही देखने लगे, कल्ली  को लगा कि उसके पीछे की और इशारा किया है,

वह पीछे पलटी वहां कोई नहीं था,  मगर सब उसे ही देख रहे थे,  वह कुछ समझी नहीं।

हां यही है मेरी जीवन संगिनी इस घर की होने वाली बहू, कल्ली

वातावरण में एकदम सन्नाटा छा गया।

कल्ली हतप्रब्ध थी

मालिककल्ली चीख पड़ी

यह कैसा मजाक है?”

रवि चलता हुआ उसके पास चुका था।

कल्ली का कंधा पकड़कर बोलायह मजाक नहीं हकीकत है

कल्ली के हाथ से कॉफी की ट्रेन छूट पड़ी।

वह रवि के पैरों में गिर गई।

नहीं मालिक यह आपको क्या हो गया है मैं तो आपके पैरों की धूल भी नहीं हूं

नहीं कल्ली तुम ही हो मेरी सच्ची जीवनसाथीरवि ने उसे उठाया

याद है तुमने एक दिन कहा था कि जीवन साथी कैसा हो?”

तुमने कहा था मेरी जिससे शादी हो बहुत सुंदर ना भी हो मगर मन की सुंदर होना चाहिए,  सुख दुख में मेरा साथ दे,  समझदार हो और मुझे अपने हाथ का बना खाना खिलाए,  मेरे पापा की सेवा करें।

कल्ली मैंने बहुत खोजा मगर मुझे तुमसे अच्छा कोई ना मिला,  जिसमें यह सब गुण हो,  तुम ही तो थी जिसने मेरे दुख में आंसू बहाए, और मेरी हर खुशी में मुझसे ज्यादा खुश हुईं,  पापा की जितनी तुमने सेवा की उतनी तो मैंने भी नहीं की,  मेरे जीवन में हमेशा तुम छाया की तरह रहीं।

यह सब देखकर रश्मि को तो चक्कर गए और प्रिया तो बेहोश हो गई।

कुछ ने इसे अपना अपमान समझा और पागल कहते हुए चले गए, परंतु अधिकांश खुश थे खासकर हवेली वाले तो खुशी मैं रोए दे रहे थे।

एक बार फिर हवेली दुल्हन की तरह सजी थी आज बड़े धूमधाम से रवि कृष्णा की शादी हुई कन्यादान रफीक चाचा ने किया।

फेरे के बाद दोनों गुप्ता जी की तस्वीर के सामने सर झुकाए खड़े थे,  गुप्ता जी का हंसता हुआ चेहरा मानो कह रहा हो किरवि तूने सही जीवन साथी चुना है मैं खुश हूं।

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