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कौन हो तुम

by Madhuri Dubey
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यदि मैं डगमगाऊ बड़ के हाथ थाम लेती हो,
मैं कहूं या ना कहूं हर बात समझ लेती हो,
कभी अंधेरे में घिरूं तो चिराग की रोशनी देती हो,
कभी चोट लगे तो मरहम लगा देती हो,

आंसू छलक भी ना पाए उन्हें पोंछ देती हो,
दूर हो या पास मेरे दिल के करीब होती हो,
क्या कहूं मैं कौन हो तुम,
या हो जन्नत का फरिश्ता या फिर हो कोई परी।

खुशियां दी है जितनी तुमने इतनी गिनती मुझे आती नहीं,
मुस्कुराहटें दी है जितनी बहुतों को सही जाती नहीं,
बस तुम्हारे आने की आहट मुझ में ऊर्जा भर देती है,
कहीं कोई भी दर्द हो उसे छूमंतर कर देती है,
होली हो या दिवाली तुम्हारे बिना मनती नहीं,
तुमसे बेहतर आसपास मुझे कोई दिखता नहीं,
क्या कहूं मैं कौन हो तुम,
या हो जन्नत का फरिश्ता या फिर हो कोई परी।
रिश्ता कोई भी हो तुमने उसे बेहतर निभाया,
बेटी हो या बहू मां हो या बीवी तुम हमेशा नंबर वन रही,
बहन ऐसी कि मुझसे बेहतर कोई जानता नहीं,
प्रशासन का भी सिर तुमने अपने काम से ऊंचा किया,
आज मैं समझ पाई तुम कोई और नहीं हमें मिला कोई वरदान हो,
प्रभु तुम्हें बुरी नजर से बचाए अच्छा स्वस्थ यश कीर्ति दे,
तुम्हारी सभी इच्छाओं को पूरा करें बहुत-बहुत शुभकामनाओं सहित, दीदी

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