Home Poetry काश मैं लड़का होती ।

काश मैं लड़का होती ।

by Vishakha Choubey
0 comment < 1 minute read
काश मैं लड़का होती । - MyBlogUs

जब घर से निकलने से पहले सोचना पड़ता है,
जब ज्यादा भीड़ देख दुप्पट्टा ओढ़ना पड़ता है,
तब सोचती हूं कि काश में लड़का होती।

जब रात को बाहर जाने से रोका जाता है,
जब कपड़ो के किए टोका जाता है,
जब मासिक धर्म में एक कोने में सोना पड़ता है,
जब अपना हक़ न मिलने पे चुप खड़ा होना पढता है,
तब सोचती हूं कि काश मै लड़का होती।

जब गलियारों में छेड़ा जाता है,
जब अकेला देखा घेरा जाता है
जब कपडे की लंबाई से चरित्र नापा जाता है,
जब आवाज़ उठाने पर अम्ल फैका जाता है,
तब सोचती हूं कि काश में लड़का होती।

जब अपने ही घर में पराई कहलाती हूं,
जब अपने ही घर में निमंत्रण पे बुलाई जाती हूं,
जब ससुराल में दहेज़ से तोली जाती हूं,
तब सोचती हूं कि काश में लड़का होती।

Related Articles

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More

Privacy & Cookies Policy